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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्याय और 18 जीवन बदलने वाले संदेश

 


श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्याय – 18 जीवन बदलने वाले संदेश

श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्याय अगर हम जीवन में उतारे तो हर क्षेत्र में कामयाब होने के अवसर बढ जाते हैं
 यह हमें कर्तव्य, ज्ञान, भक्ति, आत्मविश्वास, मानसिक शांति और सफलता—का मार्ग भी दिखाते हैं।
 यदि हम इन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में अपनाएँ, तो  अपना जीवन अधिक संतुलित, सुखी और सार्थक बना सकते हैं 

भगवद्गीत धार्मिक ग्रंथ तथा  जीने की कला सिखाने वाला दिव्य ज्ञान है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वे आज भी हर व्यक्ति के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं। गीता के 18 अध्याय जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं और हमें सही निर्णय लेने, कर्तव्य निभाने तथा आत्मिक शांति प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं।

1. अध्याय 1 – मोह ही दुख का कारण है

जब मनुष्य मोह और भ्रम में फँस जाता है, तब उसका विवेक कमजोर पड़ जाता है। इसलिए जीवन में सत्य को स्वीकार करना आवश्यक है।आज कल मेरा क्या होगा ,मेरी फॅमिली मेरा घर ,मेरे माता मेरे पिता मेरी कार मेरी जमीन जयदाद सब में इतना फसें हैं की जीवन जिने के असली लक्ष्य को हम भुलते जा रहे हैं 

2. अध्याय 2 – आत्मा अमर है

शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, इसलिए मृत्यु का भय छोड़कर धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।धर्म का मार्ग और वस्तू उपभोग दोनों अलग चिजें हैं 

3. अध्याय 3 – कर्म करो, फल की चिंता मत करो

मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल पर नहीं। निःस्वार्थ कर्म ही सफलता और शांति का मार्ग है।

4.अध्याय 4 – ज्ञान अज्ञान का नाश करता है

सच्चा ज्ञान जीवन के अंधकार को दूर करता है। ज्ञान से ही मनुष्य सही और गलत का निर्णय कर सकता है।

5. अध्याय 5 – शांति अपने भीतर खोजो

बाहरी वस्तुओं में सुख खोजने वाला कभी संतुष्ट नहीं होता। वास्तविक शांति हमारे भीतर ही है।

6. अध्याय 6 – मन पर विजय सबसे बड़ी विजय है

जिसने अपने मन को नियंत्रित कर लिया, उसने संसार की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली।

7. अध्याय 7 – श्रद्धा ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है


भगवान तक पहुँचने के लिए सच्ची श्रद्धा और विश्वास आवश्यक है।

8. अध्याय 8 – अंतिम समय का भाव महत्वपूर्ण है

मनुष्य जिस भाव से जीवन बिताता है और अंतिम समय में जिस भावना का स्मरण करता है, वही उसकी आगे की गति निर्धारित करती है।

9. अध्याय 9 – परमात्मा हर कण में विद्यमान हैं

ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के प्रत्येक कण में विद्यमान हैं।लोग 

10. अध्याय 10 – ईश्वर ही सृष्टि का आदि और अंत हैं

समस्त ब्रह्मांड का आरंभ और अंत भगवान से ही है। वही समस्त शक्तियों का मूल स्रोत हैं।

11. अध्याय 11 – समय के सामने सब असहाय हैं

भगवान का विराट स्वरूप हमें यह सिखाता है कि समय सबसे शक्तिशाली है। हमें केवल अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।

12. अध्याय 12 – भक्ति सबसे सरल मार्ग है

निस्वार्थ प्रेम और भक्ति के माध्यम से भगवान को सहज रूप से प्राप्त किया जा सकता है।

13. अध्याय 13 – शरीर और आत्मा का ज्ञान

शरीर एक क्षेत्र है, जबकि आत्मा उसका जानने वाला है। आत्मज्ञान ही मुक्ति का आधार है।

14. अध्याय 14 – तीन गुणों से ऊपर उठना



सत्त्व, रज और तम – इन तीन गुणों से ऊपर उठकर ही मनुष्य सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करता है।

15. अध्याय 15 – परमात्मा संसार रूपी वृक्ष की जड़ हैं

समस्त सृष्टि का आधार परमात्मा हैं। उनसे जुड़कर ही जीवन सार्थक बनता है।

16. अध्याय 16 – अहंकार का त्याग करें

दैवी गुण जैसे सत्य, दया, विनम्रता और क्षमा अपनाएँ तथा अहंकार, क्रोध और लोभ से दूर रहें।

17. अध्याय 17 – जैसी श्रद्धा, वैसा व्यक्तित्व

मनुष्य की श्रद्धा ही उसके विचार, कर्म और व्यक्तित्व का निर्माण करती है।

18. अध्याय 18 – पूर्ण समर्पण ही मुक्ति का मार्ग



भगवान श्रीकृष्ण अंत में अर्जुन को सिखाते हैं कि अहंकार छोड़कर ईश्वर पर विश्वास और समर्पण करने से भय, भ्रम और दुख दूर होते हैं। यह अध्याय गीता के समस्त उपदेशों का सार प्रस्तुत करता है।




शनिवार, 4 जुलाई 2026

मूलांक 9: साहस, नेतृत्व और सफलता का प्रतीक | जानें व्यक्तित्व, करियर, प्रेम और उपाय

 


मूलांक 9 का संपूर्ण रहस्य | व्यक्तित्व, करियर, प्रेम, शुभ अंक, रत्न और उपाय



मूलांक 9 क्या होता है?

यदि आपका जन्म किसी भी महीने की 9, 18 या 27 तारीख को हुआ है, तो आपका मूलांक 9 होता है। अंक ज्योतिष में इस मूलांक का स्वामी मंगल ग्रह माना जाता है। मंगल साहस, पराक्रम, ऊर्जा, नेतृत्व और आत्मविश्वास का प्रतीक है। मूलांक 9 वाले लोग जीवन में चुनौतियों का डटकर सामना करते हैं और अपनी मेहनत से सफलता प्राप्त करते हैं।


मूलांक 9 वालों का व्यक्तित्व

  • ऊर्जावान और साहसी
  • नेतृत्व क्षमता से भरपूर
  • न्यायप्रिय और स्पष्टवादी
  • दूसरों की मदद करने वाले
  • आत्मविश्वासी और कर्मठ
  • समाज में सम्मान पाने वाले

मूलांक 9 की छिपी हुई शक्तियाँ

  • कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते।
  • दूसरों को प्रेरित करने की क्षमता रखते हैं।
  • बड़े निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।
  • लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पूरी मेहनत करते हैं।
  • समाज सेवा और मानवता की भावना रखते हैं।

आध्यात्मिक रहस्य

मूलांक 9 का संबंध मंगल देव, हनुमान जी और माँ दुर्गा की शक्ति से माना जाता है। नियमित पूजा, मंत्र जाप और सेवा कार्य करने से मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और सफलता में वृद्धि होती है।


करियर और व्यवसाय

मूलांक 9 वालों के लिए ये क्षेत्र शुभ माने जाते हैं—

  • सेना
  • पुलिस
  • प्रशासन
  • राजनीति
  • खेल
  • इंजीनियरिंग
  • चिकित्सा
  • व्यवसाय
  • सामाजिक सेवा

प्रेम और वैवाहिक जीवन

मूलांक 9 वाले लोग प्रेम में ईमानदार और समर्पित होते हैं। हालांकि इनका तेज स्वभाव और गुस्सा कभी-कभी रिश्तों में तनाव पैदा कर सकता है। धैर्य और संवाद बनाए रखने से संबंध मजबूत रहते हैं।


आर्थिक स्थिति

मेहनत के बल पर धन अर्जित करते हैं। जीवन में धीरे-धीरे आर्थिक स्थिरता आती है। अनावश्यक खर्च से बचना इनके लिए लाभदायक रहता है।


स्वास्थ्य

  • रक्तचाप
  • सिरदर्द
  • रक्त संबंधी समस्याएँ
  • चोट लगने की संभावना

नियमित व्यायाम, योग और संतुलित भोजन लाभकारी रहता है।


शुभ जानकारी

  • ग्रह स्वामी: मंगल
  • शुभ अंक: 9
  • शुभ तिथियाँ: 9, 18, 27
  • शुभ वार: मंगलवार
  • शुभ रंग: लाल, केसरिया, मैरून
  • शुभ दिशा: दक्षिण
  • शुभ रत्न: मूंगा (ज्योतिषीय सलाह के बाद ही धारण करें)

मूलांक 9 वालों के लिए उपाय

  • मंगलवार को हनुमान जी की पूजा करें।
  • "ॐ अं अंगारकाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
  • हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • लाल वस्त्र, मसूर दाल या गुड़ का दान करें।
  • क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण रखें।
  • प्रतिदिन सूर्योदय के समय सूर्य को जल अर्पित करें।

मूलांक 9 वाले लोग साहसी, पराक्रमी और नेतृत्व क्षमता से भरपूर होते हैं। यदि वे अपने गुस्से पर नियंत्रण रखें और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें, तो जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। सेवा, अनुशासन और आत्मविश्वास इनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं।

जय श्री हनुमान। 🙏

मंगलवार, 30 जून 2026

जुलाई 2026 मासिक राशिफल: सभी 12 राशियों का विस्तृत भविष्यफल, करियर, धन, प्रेम और स्वास्थ्य

 

जुलाई 2026 मासिक राशिफल: सभी 12 राशियों का 


जुलाई 2026 मासिक राशिफल

जुलाई 2026 का महीना कई राशियों के लिए नई उम्मीदें, नए अवसर और महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आ रहा है। इस महीने कुछ लोगों को करियर में सफलता मिलेगी, तो कुछ को आर्थिक मामलों में सतर्क रहने की आवश्यकता होगी। प्रेम संबंध, पारिवारिक जीवन, शिक्षा, व्यापार और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी ग्रहों की स्थिति अलग-अलग प्रभाव डालेगी।

आइए जानते हैं सभी 12 राशियों का विस्तृत मासिक राशिफल।


♈ मेष राशि (Aries)

मान्यता है कि चंद्रभागा नदी में स्नान करने से मन और आत्मा की शुद्धि होती है। भक्त मंदिर में दर्शन से पहले चंद्रभागा में स्नान करते हैं। नदी का अर्धचंद्राकार स्वरूप होने के कारण इसका नाम "चंद्रभागा" पड़ा। पंढरपुर की रेती को भी अत्यंत पवित्र माना जाता है। संत परंपरा में कहा जाता है कि इस रेती पर अनगिनत संतों और वारकरियों के चरण पड़े हैं। इसलिए श्रद्धालु इस रेती को माथे से लगाकर भगवान विठ्ठल का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आषाढ़ी वारी केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा, समानता और प्रेम का उत्सव है। हजारों दिंडियाँ कई दिनों की पदयात्रा करके भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुँचती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।
जुलाई 2026 में मेष राशि के लिए करियर, धन, प्रेम, वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन का विस्तृत मासिक राशिफल।

जुलाई का महीना मेष राशि वालों के लिए ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरा रहेगा। लंबे समय से रुके हुए कार्य पूरे होने के योग बन रहे हैं। नौकरी करने वाले लोगों को नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। व्यापार में नए ग्राहकों से लाभ होगा।

करियर

कार्यस्थल पर आपकी मेहनत की सराहना होगी। प्रमोशन या वेतन वृद्धि की संभावना बन सकती है।

आर्थिक स्थिति

आय के नए स्रोत बनेंगे। खर्च भी बढ़ेंगे लेकिन संतुलन बना रहेगा।

प्रेम जीवन

जीवनसाथी का पूरा सहयोग मिलेगा। अविवाहित लोगों के लिए अच्छे रिश्ते आ सकते हैं।

स्वास्थ्य

पेट और सिर दर्द की समस्या से बचें। नियमित व्यायाम करें।

शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 9


♉ वृषभ राशि (Taurus)

वृषभ राशि (Taurus) जुलाई 2026 राशिफल की प्रतीकात्मक तस्वीर, जिसमें वृषभ राशि का चिन्ह और जुलाई महीने का भविष्यफल दर्शाया गया है।
जुलाई 2026 में वृषभ राशि के लिए करियर, धन, प्रेम, वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन का विस्तृत मासिक राशिफल।

इस महीने धैर्य रखने की आवश्यकता होगी। जल्दबाजी में लिया गया निर्णय नुकसान पहुंचा सकता है।

करियर

नौकरी में स्थिरता रहेगी। वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलेगा।

व्यापार

नया निवेश सोच-समझकर करें।

धन

बचत बढ़ेगी। पुराने रुके हुए पैसे मिलने की संभावना है।

प्रेम

रिश्तों में मधुरता बनी रहेगी।

स्वास्थ्य

गले और सर्दी-जुकाम से सावधान रहें।

शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 6


♊ मिथुन राशि (Gemini)

जुलाई 2026 में वृषभ राशि के लिए करियर, धन, प्रेम, वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन का विस्तृत मासिक राशिफल।
जुलाई 2026 में मिथुन राशि के लिए करियर, धन, प्रेम, वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन का विस्तृत मासिक राशिफल।

यह महीना आपके लिए भाग्यशाली साबित हो सकता है। शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलने के योग हैं।

करियर

नई नौकरी का अवसर मिल सकता है।

धन

आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

परिवार

परिवार में खुशियों का माहौल रहेगा।

प्रेम

प्रेम संबंध मजबूत होंगे।

स्वास्थ्य

मानसिक तनाव कम रहेगा।

शुभ रंग: हरा
शुभ अंक: 5


♋ कर्क राशि (Cancer)




भावनात्मक फैसले लेने से बचें। परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा।

करियर

कार्यभार अधिक रहेगा।

धन

अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रखें।

प्रेम

जीवनसाथी के साथ संबंध मधुर रहेंगे।

स्वास्थ्य

नींद पूरी लें।

शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 2


♌ सिंह राशि (Leo)



यह महीना नेतृत्व क्षमता को बढ़ाएगा। समाज में मान-सम्मान मिलेगा।

करियर

उच्च पद मिलने की संभावना है।

व्यापार

नई योजनाएं सफल होंगी।

धन

आर्थिक लाभ के योग हैं।

प्रेम

रिश्तों में विश्वास बढ़ेगा।

स्वास्थ्य

हृदय और रक्तचाप का ध्यान रखें।

शुभ रंग: सुनहरा
शुभ अंक: 1


♍ कन्या राशि (Virgo)



योजना बनाकर कार्य करने से सफलता मिलेगी।

करियर

नई जिम्मेदारी मिल सकती है।

धन

बचत पर ध्यान दें।

प्रेम

गलतफहमी दूर होगी।

स्वास्थ्य

पाचन तंत्र का ध्यान रखें।

शुभ रंग: हरा
शुभ अंक: 5


♎ तुला राशि (Libra)



संतुलित व्यवहार से सभी कार्य पूरे होंगे।

करियर

नौकरी में तरक्की मिलेगी।

व्यापार

नई साझेदारी लाभदायक रहेगी।

धन

आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

प्रेम

दांपत्य जीवन सुखद रहेगा।

स्वास्थ्य

कमर दर्द की समस्या हो सकती है।

शुभ रंग: गुलाबी
शुभ अंक: 6


♏ वृश्चिक राशि (Scorpio)





धैर्य और संयम सफलता दिलाएंगे।

करियर

कठिन परिश्रम का फल मिलेगा।

धन

निवेश में लाभ होगा।

प्रेम

रिश्तों में विश्वास बनाए रखें।

स्वास्थ्य

तनाव कम करें।

शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 9


♐ धनु राशि (Sagittarius)





यात्रा और नए अवसरों का महीना रहेगा।

करियर

विदेश से जुड़े कार्य सफल होंगे।

धन

आर्थिक लाभ मिलेगा।

प्रेम

प्रेम जीवन अच्छा रहेगा।

स्वास्थ्य

योग और ध्यान करें।

शुभ रंग: पीला
शुभ अंक: 3


♑ मकर राशि (Capricorn)




मेहनत का पूरा फल मिलेगा।

करियर

प्रमोशन के योग हैं।

व्यापार

लाभ बढ़ेगा।

धन

बचत में वृद्धि होगी।

प्रेम

परिवार का सहयोग मिलेगा।

स्वास्थ्य

घुटनों का ध्यान रखें।

शुभ रंग: नीला
शुभ अंक: 8


♒ कुंभ राशि (Aquarius)





रचनात्मक कार्यों में सफलता मिलेगी।

करियर

नई नौकरी का अवसर मिलेगा।

धन

आर्थिक स्थिति सामान्य से बेहतर रहेगी।

प्रेम

रिश्तों में मधुरता आएगी।

स्वास्थ्य

पर्याप्त आराम करें।

शुभ रंग: आसमानी
शुभ अंक: 4 डी


♓ मीन राशि (Pisces)






आध्यात्मिक रुचि बढ़ेगी। परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी।

करियर

नए अवसर प्राप्त होंगे।

धन

आय में वृद्धि होगी।

प्रेम

जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा।

स्वास्थ्य

मानसिक शांति बनाए रखें।

शुभ रंग: पीला
शुभ अंक: 7


जुलाई 2026 के लिए सामान्य ज्योतिषीय सुझाव

  • प्रतिदिन सुबह सूर्य को जल अर्पित करें।
  • भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करें।
  • मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • गुरुवार को पीले वस्त्र या पीली वस्तुओं का दान करें।
  • शनिवार को जरूरतमंदों की सहायता करें।
  • क्रोध और अहंकार से बचें।
  • नियमित ध्यान और योग करें।

निष्कर्ष

जुलाई 2026 का महीना अधिकांश राशियों के लिए नई संभावनाओं और सकारात्मक बदलावों का संकेत देता है। मेहनत, धैर्य और सही निर्णय के साथ आप इस महीने अपने जीवन के कई क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। ग्रहों के शुभ प्रभाव का पूरा लाभ उठाने के लिए सकारात्मक सोच रखें, नियमित पूजा-पाठ करें और अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें।

यदि आपको यह जुलाई 2026 मासिक राशिफल पसंद आया हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें तथा ऐसी ही धार्मिक, ज्योतिष और राशिफल से जुड़ी जानकारी के लिए हमारे ब्लॉग पर नियमित रूप से विजिट करें।

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  • अस्वीकरण: यह राशिफल सामान्य ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। व्यक्तिगत जीवन के सटीक मार्गदर्शन के लिए किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श लें:


शुक्रवार, 26 जून 2026

चातुर्मास 2026: तिथि, महत्व, नियम, पूजा विधि और क्या करें – संपूर्ण जानकारी

भगवान विष्णु के साथ चातुर्मास 2026 का पोस्टर, जिसमें चातुर्मास की तिथियां, धार्मिक महत्व, पूजा विधि, नियम, दान और प्रमुख पर्वों की जानकारी दी गई है।
चातुर्मास 2026: भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए जानें चातुर्मास की तिथि, महत्व, पूजा विधि, व्रत के नियम और दान का महत्व।

चंद्र मास की गणना के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार महीनों की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।

चातुर्मास के आरंभ की आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी तथा समापन की कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शयन उत्सव तथा प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागरण (प्रबोधन) उत्सव का आयोजन किया जाता है।

हिंदू धर्म में आचार-विचार की दृष्टि से इस अवधि का विशेष महत्व है। ये चार महीने मुख्यतः वर्षा ऋतु के होते हैं। इस समय विशेष यात्राएँ नहीं की जातीं। सूर्य का पर्याप्त दर्शन न होना, पीने के पानी का दूषित होना, मौसम में लगातार परिवर्तन तथा मनुष्य की असावधानी जैसे अनेक कारणों से इस अवधि में रोगों की संभावना अधिक रहती है। ऐसे समय में यदि आहार पर नियंत्रण रखा जाए, उपवास तथा अन्य नियमों का पालन किया जाए तो स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। इसलिए प्राचीन ऋषि-मुनियों ने धार्मिक व्रतों के साथ इन नियमों को जोड़कर चातुर्मास को साधना और उपासना का विशेष काल माना हैं!

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जीवन में संयम का बहुत महत्व है, लेकिन उसे सहज रूप से अपनाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए कम से कम व्रत-उपवास के माध्यम से ही सही, संयम का पालन करने का उद्देश्य रखा गया है। व्रत और नियम मन को अंतर्मुखी बनाते हैं, चित्त को नियंत्रित करते हैं तथा जीवन में संयम और एकाग्रता लाने में सहायता करते हैं। व्रतों के पालन से व्यक्ति का लौकिक और आध्यात्मिक जीवन समृद्ध होता है तथा समाज जीवन भी अधिक सुसंस्कृत बनता है।

आज के भागदौड़, तनाव और तेज़ रफ्तार वाले वातावरण में अधिकांश लोगों का मन अशांत रहता है। इसका प्रभाव शरीर के साथ-साथ व्यक्ति के भावनात्मक जीवन पर भी पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में व्रत, उपासना तथा देवताओं, सिद्धों, संतों और सत्पुरुषों का स्मरण एवं आराधना करने से मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है, मनोबल बढ़ता है तथा श्रद्धा और भक्ति में वृद्धि होती है। चातुर्मास में किए जाने वाले व्रत, उपवास और पर्व इसी उद्देश्य को पूर्ण करते हैं।

त्योहारों की एक अलग ही रौनक होती है। चारों ओर उत्साह, चेतना और प्रसन्नता का वातावरण बना रहता है। सृष्टि में भी नवसृजन का चक्र निरंतर चलता रहता है। जब मनुष्य का संबंध व्रत और त्योहारों से जुड़ता है, तब उसके मन की निराशा और वैफल्य दूर होकर उसमें नई ऊर्जा का संचार होता है। वह अधिक दृढ़ बनता है तथा उसके जीवन में अच्छे संस्कार, सात्त्विकता, उदारता, कर्मों में एकाग्रता और पवित्रता आती है।

अब तक आपने चातुर्मास के व्रतों तथा उनके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी प्राप्त की। अब चातुर्मास से संबंधित अन्य बातों को भी जानिए। चातुर्मास के समय भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में रहते हैं। इसलिए उनके दिव्य तेज का अंश जल में उतरकर उसे पवित्र बना देता है। इसी कारण इस काल में प्राकृतिक जलाशयों में स्नान करना पुण्यदायक माना गया है। पवित्र नदियों तथा उनके संगम में स्नान करने से पापों का नाश होता है। इस अवधि में आँवला, तिल और बेलपत्र मिश्रित जल से स्नान करने से अनेक दोषों का निवारण होता है।

कमल पर विराजमान शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए श्री विष्णु भगवान की दिव्य एवं सुंदर 9:16 छवि।
सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री विष्णु की दिव्य छवि। इनका स्मरण जीवन में शांति, समृद्धि, धर्म और सुख का मार्ग प्रशस्त करता है। ॐ नमो नारायणाय।


इस समय भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। इसलिए इन दोनों देवताओं की प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु को चंपा के फूल और तुलसी अर्पित करनी चाहिए, जबकि भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें सफेद फूल और बेलपत्र चढ़ाने चाहिए। देवघर में प्रतिदिन शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे घर में मंगलमय वातावरण का निर्माण होता है।

जप करने से चित्त शुद्ध होता है, इसलिए चातुर्मास में जप का विशेष महत्व बताया गया है। जप करने से पहले कुलदेवता, इष्टदेवता और सद्गुरु का स्मरण करना चाहिए। जिस देवता का नामस्मरण कर रहे हों, यह भावना रखनी चाहिए कि वे देवता हमारे सामने विराजमान होकर हमें आशीर्वाद दे रहे हैं। एकांत में शांत मन से जप करना चाहिए। जप का समय निश्चित रखना चाहिए। इससे नियमित रूप से उपासना करने की आदत विकसित होती है।

चातुर्मास में नियमित रूप से सत्संग करना चाहिए। संत-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने चाहिए। देवदर्शन, कीर्तन और प्रवचन आदि में अवश्य जाना चाहिए। श्रेष्ठ साधकों और गुरुजनों की संगति में रहना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। उनके आध्यात्मिक अनुभवों को सुनना चाहिए तथा अपनी आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान उनसे प्राप्त करना चाहिए।

चातुर्मास में सत्साहित्य के ग्रंथों का नियमित पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए ज्ञानेश्वरी, एकनाथी भागवत, दासबोध, संतों की अभंग गाथा, श्री गुरुचरित्र, हरिविजय, रामविजय, श्री गजानन विजय, श्री साई सच्चरित्र, श्री गुरुलीलामृत, नवनाथ भक्तिसार, समश्लोकी आदि ग्रंथों का अकेले या सामूहिक रूप से पाठ करना चाहिए। उनके प्रसंगों को समझकर सुनाना तथा उन पर चर्चा करना भी लाभदायक होता है।

चातुर्मास में दान का विशेष महत्व है। दान करने से लोभ और आसक्ति कम होती है तथा यह एक प्रकार की तपस्या भी है। शास्त्रों में दान के अनेक प्रकार और उनके फल बताए गए हैं, लेकिन भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे श्रेष्ठ दान माना गया है। इसलिए चातुर्मास में प्रतिदिन गाय को घास खिलानी चाहिए। यदि कोई भूखा व्यक्ति भोजन मांगे, तो उसे तुरंत भोजन कराना चाहिए। जल, वस्त्र, धन, छाता, विद्या तथा वर्तमान समय में रक्तदान भी अत्यंत श्रेष्ठ दान माने गए हैं। इसलिए यदि कोई आवश्यकता व्यक्त करे, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता अवश्य करनी चाहिए।

चातुर्मास में सत्य बोलना, पवित्र रहना तथा गुरु, देवता और पितरों का तर्पण करना चाहिए। साथ ही आत्मचिंतन करना चाहिए। अपने दोषों को दूर करने और अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए।

चातुर्मास के दौरान मांस, शहद, प्याज, लहसुन, ग्वार की फली, बैंगन, चवली (लोबिया), सफेद पावटे (सेम), तथा कद्दू जैसे पदार्थों का त्याग करना चाहिए। व्रत का पालन करना चाहिए। मन को ईश्वर के चिंतन में लगाना चाहिए। परनिंदा और परसेवा का दिखावा नहीं करना चाहिए। चातुर्मास के लिए बताए गए ये नियम केवल चार महीनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी के लिए हर समय उपयोगी हैं। इसलिए इन नियमों और व्रतों का अभ्यास चातुर्मास से शुरू करके जीवनभर अपनाना चाहिए।

चातुर्मास में किए जाने वाले व्रत आरंभ करने से पहले उनसे संबंधित आहार-विहार के नियम अच्छी तरह समझ लेने चाहिए। इसके बाद अपनी शारीरिक क्षमता और कार्य के अनुसार महासंकल्प करना चाहिए। फिर प्रतिदिन केवल लघुसंकल्प करना चाहिए। चार महीने पूरे होने पर व्रत की पूर्णाहुति के लिए आवश्यक विधि करनी चाहिए। इसमें हवन, पूजा, दान और संतर्पण आदि का समावेश होता है। कार्तिकी एकादशी का उपवास करके द्वादशी के दिन महापारण किया जाता है। इस महापारण के दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वादशी को व्रत का विधिवत समापन माना जाता है।

द्वादशी को चातुर्मास व्रत समाप्त करने की भी परंपरा है। कुछ लोग इसे कार्तिक पूर्णिमा को पूर्ण करते हैं। चातुर्मास में जिन वस्तुओं का त्याग किया जाता है, उनका पहले दान करके ही उनका पुनः सेवन किया जाता हैं


चातुर्मास 2026

हिंदू धर्म में चातुर्मास अत्यंत पवित्र और शुभ समय माना जाता है। यह चार महीनों की अवधि होती है, जिसमें भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान और सत्संग का विशेष महत्व बताया गया है।

संत, महात्मा और साधु भी चातुर्मास में एक स्थान पर रहकर धर्मोपदेश, कथा और साधना करते हैं।


चातुर्मास 2026 कब है?

वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से होगी और इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर होगा।

अवधि: लगभग चार महीने


चातुर्मास का धार्मिक महत्व

पुराणों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश और मुंडन आदि नहीं किए जाते।

देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत होते हैं और पुनः सभी शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।


चातुर्मास में क्या करें?

  • प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
  • श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • तुलसी पूजा करें।
  • गरीबों को भोजन, वस्त्र और अन्न का दान करें।
  • गौ सेवा और ब्राह्मण सेवा करें।
  • सात्विक भोजन ग्रहण करें।

चातुर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?

  • मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का सेवन न करें।
  • झूठ, क्रोध और निंदा से बचें।
  • अनावश्यक यात्रा से बचना चाहिए।
  • अधिक विलासिता और व्यसनों से दूर रहें।

चातुर्मास में दान का महत्व

धर्मग्रंथों में चातुर्मास के दौरान किए गए दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।

दान में आप कर सकते हैं—

  • अन्नदान
  • वस्त्रदान
  • जलदान
  • गौसेवा
  • धार्मिक पुस्तकों का वितरण
  • गरीब विद्यार्थियों की सहायता

चातुर्मास में विशेष पर्व

  • देवशयनी एकादशी
  • गुरु पूर्णिमा
  • नाग पंचमी
  • रक्षाबंधन
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
  • गणेश चतुर्थी
  • अनंत चतुर्दशी
  • पितृ पक्ष
  • शारदीय नवरात्रि
  • दशहरा
  • शरद पूर्णिमा
  • करवा चौथ
  • अहोई अष्टमी
  • धनतेरस
  • दीपावली
  • गोवर्धन पूजा
  • भाई दूज
  • देवउठनी एकादशी

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चातुर्मास का आध्यात्मिक संदेश

चातुर्मास केवल व्रत और नियमों का समय नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, सेवा, दया और भक्ति का पर्व है। जो व्यक्ति इस अवधि में श्रद्धा से भगवान विष्णु की उपासना करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

चातुर्मास 2026 भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम और धर्म पालन का श्रेष्ठ अवसर है। यदि आप इस अवधि में नियमित पूजा, जप, दान और सात्विक जीवन अपनाते हैं, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार आपको विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।



Q1. चातुर्मास 2026 कब शुरू होगा?
उत्तर: चातुर्मास 2026 की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी से होगी।

Q2. चातुर्मास कब समाप्त होगा?
उत्तर: कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी पर।

Q3. चातुर्मास में विवाह क्यों नहीं होते?
उत्तर: क्योंकि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए शुभ मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं।

Q4. चातुर्मास में सबसे श्रेष्ठ कार्य कौन-सा है?
उत्तर: भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, दान, सत्संग और सात्विक जीवन

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गुरुवार, 25 जून 2026

गुरु पूर्णिमा 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

 

महर्षि वेद व्यास की प्रेरणादायक छवि, गुरु पूर्णिमा 2026, गुरु पूजा, भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा का आध्यात्मिक पोस्टर।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर महर्षि वेद व्यास को नमन। भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का प्रतीक।


गुरु पूर्णिमा 2026 बुधवार, 29 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि है, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

महर्षि वेदव्यास और गुरु पूर्णिमा का महत्व

भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अत्यंत ऊँचा माना गया है। गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है। गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।


महर्षि वेदव्यास कौन थे?

महर्षि वेदव्यास भारतीय इतिहास और सनातन धर्म के महानतम ऋषियों में से एक माने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम कृष्ण द्वैपायन व्यास था। वे महर्षि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे।

महर्षि वेदव्यास को भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। उन्होंने अपने ज्ञान, तपस्या और विद्वता से संपूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया। वे केवल एक ऋषि ही नहीं, बल्कि महान लेखक, दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु भी थे।


महर्षि वेदव्यास का योगदान

महर्षि वेदव्यास का सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में अमूल्य योगदान है।

1. वेदों का विभाजन

प्राचीन काल में वेद एक ही थे। महर्षि वेदव्यास ने मानव कल्याण के लिए उन्हें चार भागों में विभाजित किया:

  • ऋग्वेद
  • यजुर्वेद
  • सामवेद
  • अथर्ववेद

इसी कारण उन्हें वेदव्यास कहा गया।

2. महाभारत की रचना

महर्षि वेदव्यास ने विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत की रचना की। महाभारत में जीवन, धर्म, नीति और कर्तव्य का गहन ज्ञान मिलता है।

3. श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसार

महाभारत का ही एक महत्वपूर्ण भाग भगवद्गीता है, जो आज भी करोड़ों लोगों को जीवन का मार्ग दिखाती है।

4. अठारह पुराणों की रचना

महर्षि वेदव्यास ने अठारह महापुराणों की रचना कर धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया।


गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, संस्कार और कृतज्ञता का उत्सव भी है।


गुरु पूर्णिमा और महर्षि वेदव्यास का संबंध

गुरु पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा कहा जाता है।

महर्षि वेदव्यास ने मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य खजाना प्रदान किया। उनके कारण ही वेद, पुराण, महाभारत और गीता का ज्ञान आज भी उपलब्ध है। इसी वजह से उन्हें जगद्गुरु कहा जाता है।

गुरु पूर्णिमा पर सबसे पहले महर्षि वेदव्यास को स्मरण किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।


गुरु का महत्व

शास्त्रों में कहा गया है:

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं। ऐसे गुरु को बार-बार प्रणाम है।

गुरु हमें केवल शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की सही दिशा भी प्रदान करते हैं।


गुरु पूर्णिमा पर क्या करें?

गुरु का सम्मान करें

अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें और उनका आशीर्वाद लें।

दान-पुण्य करें

गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करें।

आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ें

भगवद्गीता, रामायण और महाभारत का पाठ करें।

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आत्मचिंतन करें

गुरु द्वारा दिए गए उपदेशों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लें।

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गुरु पूर्णिमा का संदेश

गुरु पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि जीवन में सफलता और ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। गुरु हमारे जीवन के अंधकार को दूर कर हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

महर्षि वेदव्यास का जीवन हमें ज्ञान, तपस्या और मानव सेवा का संदेश देता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महान अवसर है।

महर्षि वेदव्यास भारतीय संस्कृति के अमर प्रकाश स्तंभ हैं। उनके द्वारा दिए गए ज्ञान ने मानव समाज को नई दिशा दी है। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर हमें अपने गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए और उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

महत्वपूर्ण समय:

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 28 जुलाई 2026, शाम 6:18बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 29 जुलाई 2026, रात 8:04बजे
  • गुरु पूर्णिमा व्रत एवं पूजा: 29 जुलाई 2026 (बुधवार)

गुरुपूर्णिमा (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर हैं और गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं। ऐसे श्रीगुरुदेव को मेरा प्रणाम।

भारतीय संस्कृति में गुरु और गुरु-परंपरा को अत्यंत पवित्र माना गया है। गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए गुरुपूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास की पूजा की जाती है। महर्षि वेदव्यास महाभारत काल के महान विद्वान, ऋषि और आचार्य थे। वे ज्ञान, तपस्या और विद्वत्ता के प्रतीक माने जाते हैं।

महर्षि व्यास ने महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की तथा वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने अठारह पुराणों की भी रचना की, जिससे समाज को धर्म, नीति और जीवन मूल्यों का मार्गदर्शन मिला।

मान्यता है कि उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव कल्याण और ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें जगद्गुरु कहा जाता है और गुरुपूर्णिमा के दिन विशेष रूप से उनका स्मरण किया जाता है।

गुरुपूर्णिमा हमें अपने जीवन में गुरु के महत्व को समझने की प्रेरणा देती है। गुरु ही हमें अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसलिए इस दिन अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।


"गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है और ज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।" ✨

गुरु केवल वह नहीं होता जो हमें कुछ सिखाता है, बल्कि वह ज्ञान-साधना की एक अखंड और अनादि परंपरा का प्रतीक होता है। इसी ज्ञान से हम शिष्टाचार, सेवा-भाव, दया, प्रेम, सद्भावना, परोपकार, त्याग और कृतज्ञता जैसे अनेक श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में अपनाते हैं। इन संस्कारों के बल पर हम स्वयं का निर्माण करते हैं और साथ ही अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र की उन्नति में भी योगदान देते हैं।

इसी कारण गुरुपूर्णिमा का दिन उन सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को दिशा दी है। यह अत्यंत मंगलमय दिन माना जाता है।

इस दिन अपने गुरुजनों से मिलना चाहिए, उन्हें श्रद्धापूर्वक वस्त्र, दक्षिणा या उपहार अर्पित करना चाहिए तथा उनका सम्मान करना चाहिए। यदि गुरु इस संसार में नहीं हैं या दूर रहते हैं, तो मन ही मन उनका स्मरण करना चाहिए। उनके उपदेशों और संस्कारों का हम अपने जीवन में कितना पालन कर रहे हैं, इसका 
आत्मचिंतन करना चाहिए।गुरु के प्रति आदर, श्रद्धा और गौरव का भाव केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण में भी उतारना चाहिए। यही सच्चे अर्थों में गुरु की पूजा और उनके प्रति हमारी वास्तविक आदरांजली है। 🙏✨


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