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चंद्र मास की गणना के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार महीनों की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।
चातुर्मास के आरंभ की आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी तथा समापन की कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शयन उत्सव तथा प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागरण (प्रबोधन) उत्सव का आयोजन किया जाता है।
हिंदू धर्म में आचार-विचार की दृष्टि से इस अवधि का विशेष महत्व है। ये चार महीने मुख्यतः वर्षा ऋतु के होते हैं। इस समय विशेष यात्राएँ नहीं की जातीं। सूर्य का पर्याप्त दर्शन न होना, पीने के पानी का दूषित होना, मौसम में लगातार परिवर्तन तथा मनुष्य की असावधानी जैसे अनेक कारणों से इस अवधि में रोगों की संभावना अधिक रहती है। ऐसे समय में यदि आहार पर नियंत्रण रखा जाए, उपवास तथा अन्य नियमों का पालन किया जाए तो स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। इसलिए प्राचीन ऋषि-मुनियों ने धार्मिक व्रतों के साथ इन नियमों को जोड़कर चातुर्मास को साधना और उपासना का विशेष काल माना हैं!
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जीवन में संयम का बहुत महत्व है, लेकिन उसे सहज रूप से अपनाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए कम से कम व्रत-उपवास के माध्यम से ही सही, संयम का पालन करने का उद्देश्य रखा गया है। व्रत और नियम मन को अंतर्मुखी बनाते हैं, चित्त को नियंत्रित करते हैं तथा जीवन में संयम और एकाग्रता लाने में सहायता करते हैं। व्रतों के पालन से व्यक्ति का लौकिक और आध्यात्मिक जीवन समृद्ध होता है तथा समाज जीवन भी अधिक सुसंस्कृत बनता है।
आज के भागदौड़, तनाव और तेज़ रफ्तार वाले वातावरण में अधिकांश लोगों का मन अशांत रहता है। इसका प्रभाव शरीर के साथ-साथ व्यक्ति के भावनात्मक जीवन पर भी पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में व्रत, उपासना तथा देवताओं, सिद्धों, संतों और सत्पुरुषों का स्मरण एवं आराधना करने से मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है, मनोबल बढ़ता है तथा श्रद्धा और भक्ति में वृद्धि होती है। चातुर्मास में किए जाने वाले व्रत, उपवास और पर्व इसी उद्देश्य को पूर्ण करते हैं।
त्योहारों की एक अलग ही रौनक होती है। चारों ओर उत्साह, चेतना और प्रसन्नता का वातावरण बना रहता है। सृष्टि में भी नवसृजन का चक्र निरंतर चलता रहता है। जब मनुष्य का संबंध व्रत और त्योहारों से जुड़ता है, तब उसके मन की निराशा और वैफल्य दूर होकर उसमें नई ऊर्जा का संचार होता है। वह अधिक दृढ़ बनता है तथा उसके जीवन में अच्छे संस्कार, सात्त्विकता, उदारता, कर्मों में एकाग्रता और पवित्रता आती है।
अब तक आपने चातुर्मास के व्रतों तथा उनके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी प्राप्त की। अब चातुर्मास से संबंधित अन्य बातों को भी जानिए। चातुर्मास के समय भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में रहते हैं। इसलिए उनके दिव्य तेज का अंश जल में उतरकर उसे पवित्र बना देता है। इसी कारण इस काल में प्राकृतिक जलाशयों में स्नान करना पुण्यदायक माना गया है। पवित्र नदियों तथा उनके संगम में स्नान करने से पापों का नाश होता है। इस अवधि में आँवला, तिल और बेलपत्र मिश्रित जल से स्नान करने से अनेक दोषों का निवारण होता है।
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| सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री विष्णु की दिव्य छवि। इनका स्मरण जीवन में शांति, समृद्धि, धर्म और सुख का मार्ग प्रशस्त करता है। ॐ नमो नारायणाय। |
इस समय भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। इसलिए इन दोनों देवताओं की प्रतिदिन पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु को चंपा के फूल और तुलसी अर्पित करनी चाहिए, जबकि भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें सफेद फूल और बेलपत्र चढ़ाने चाहिए। देवघर में प्रतिदिन शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे घर में मंगलमय वातावरण का निर्माण होता है।
जप करने से चित्त शुद्ध होता है, इसलिए चातुर्मास में जप का विशेष महत्व बताया गया है। जप करने से पहले कुलदेवता, इष्टदेवता और सद्गुरु का स्मरण करना चाहिए। जिस देवता का नामस्मरण कर रहे हों, यह भावना रखनी चाहिए कि वे देवता हमारे सामने विराजमान होकर हमें आशीर्वाद दे रहे हैं। एकांत में शांत मन से जप करना चाहिए। जप का समय निश्चित रखना चाहिए। इससे नियमित रूप से उपासना करने की आदत विकसित होती है।
चातुर्मास में नियमित रूप से सत्संग करना चाहिए। संत-महात्माओं के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने चाहिए। देवदर्शन, कीर्तन और प्रवचन आदि में अवश्य जाना चाहिए। श्रेष्ठ साधकों और गुरुजनों की संगति में रहना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। उनके आध्यात्मिक अनुभवों को सुनना चाहिए तथा अपनी आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान उनसे प्राप्त करना चाहिए।
चातुर्मास में सत्साहित्य के ग्रंथों का नियमित पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए ज्ञानेश्वरी, एकनाथी भागवत, दासबोध, संतों की अभंग गाथा, श्री गुरुचरित्र, हरिविजय, रामविजय, श्री गजानन विजय, श्री साई सच्चरित्र, श्री गुरुलीलामृत, नवनाथ भक्तिसार, समश्लोकी आदि ग्रंथों का अकेले या सामूहिक रूप से पाठ करना चाहिए। उनके प्रसंगों को समझकर सुनाना तथा उन पर चर्चा करना भी लाभदायक होता है।
चातुर्मास में दान का विशेष महत्व है। दान करने से लोभ और आसक्ति कम होती है तथा यह एक प्रकार की तपस्या भी है। शास्त्रों में दान के अनेक प्रकार और उनके फल बताए गए हैं, लेकिन भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे श्रेष्ठ दान माना गया है। इसलिए चातुर्मास में प्रतिदिन गाय को घास खिलानी चाहिए। यदि कोई भूखा व्यक्ति भोजन मांगे, तो उसे तुरंत भोजन कराना चाहिए। जल, वस्त्र, धन, छाता, विद्या तथा वर्तमान समय में रक्तदान भी अत्यंत श्रेष्ठ दान माने गए हैं। इसलिए यदि कोई आवश्यकता व्यक्त करे, तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता अवश्य करनी चाहिए।
चातुर्मास में सत्य बोलना, पवित्र रहना तथा गुरु, देवता और पितरों का तर्पण करना चाहिए। साथ ही आत्मचिंतन करना चाहिए। अपने दोषों को दूर करने और अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
चातुर्मास के दौरान मांस, शहद, प्याज, लहसुन, ग्वार की फली, बैंगन, चवली (लोबिया), सफेद पावटे (सेम), तथा कद्दू जैसे पदार्थों का त्याग करना चाहिए। व्रत का पालन करना चाहिए। मन को ईश्वर के चिंतन में लगाना चाहिए। परनिंदा और परसेवा का दिखावा नहीं करना चाहिए। चातुर्मास के लिए बताए गए ये नियम केवल चार महीनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी के लिए हर समय उपयोगी हैं। इसलिए इन नियमों और व्रतों का अभ्यास चातुर्मास से शुरू करके जीवनभर अपनाना चाहिए।
चातुर्मास में किए जाने वाले व्रत आरंभ करने से पहले उनसे संबंधित आहार-विहार के नियम अच्छी तरह समझ लेने चाहिए। इसके बाद अपनी शारीरिक क्षमता और कार्य के अनुसार महासंकल्प करना चाहिए। फिर प्रतिदिन केवल लघुसंकल्प करना चाहिए। चार महीने पूरे होने पर व्रत की पूर्णाहुति के लिए आवश्यक विधि करनी चाहिए। इसमें हवन, पूजा, दान और संतर्पण आदि का समावेश होता है। कार्तिकी एकादशी का उपवास करके द्वादशी के दिन महापारण किया जाता है। इस महापारण के दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वादशी को व्रत का विधिवत समापन माना जाता है।
द्वादशी को चातुर्मास व्रत समाप्त करने की भी परंपरा है। कुछ लोग इसे कार्तिक पूर्णिमा को पूर्ण करते हैं। चातुर्मास में जिन वस्तुओं का त्याग किया जाता है, उनका पहले दान करके ही उनका पुनः सेवन किया जाता हैं
चातुर्मास 2026
हिंदू धर्म में चातुर्मास अत्यंत पवित्र और शुभ समय माना जाता है। यह चार महीनों की अवधि होती है, जिसमें भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत, दान और सत्संग का विशेष महत्व बताया गया है।
संत, महात्मा और साधु भी चातुर्मास में एक स्थान पर रहकर धर्मोपदेश, कथा और साधना करते हैं।
चातुर्मास 2026 कब है?
वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से होगी और इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर होगा।
अवधि: लगभग चार महीने
चातुर्मास का धार्मिक महत्व
पुराणों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश और मुंडन आदि नहीं किए जाते।
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत होते हैं और पुनः सभी शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।
चातुर्मास में क्या करें?
- प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा करें।
- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
- श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- तुलसी पूजा करें।
- गरीबों को भोजन, वस्त्र और अन्न का दान करें।
- गौ सेवा और ब्राह्मण सेवा करें।
- सात्विक भोजन ग्रहण करें।
चातुर्मास में क्या नहीं करना चाहिए?
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का सेवन न करें।
- झूठ, क्रोध और निंदा से बचें।
- अनावश्यक यात्रा से बचना चाहिए।
- अधिक विलासिता और व्यसनों से दूर रहें।
चातुर्मास में दान का महत्व
धर्मग्रंथों में चातुर्मास के दौरान किए गए दान को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
दान में आप कर सकते हैं—
- अन्नदान
- वस्त्रदान
- जलदान
- गौसेवा
- धार्मिक पुस्तकों का वितरण
- गरीब विद्यार्थियों की सहायता
चातुर्मास में विशेष पर्व
- देवशयनी एकादशी
- गुरु पूर्णिमा
- नाग पंचमी
- रक्षाबंधन
- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
- गणेश चतुर्थी
- अनंत चतुर्दशी
- पितृ पक्ष
- शारदीय नवरात्रि
- दशहरा
- शरद पूर्णिमा
- करवा चौथ
- अहोई अष्टमी
- धनतेरस
- दीपावली
- गोवर्धन पूजा
- भाई दूज
- देवउठनी एकादशी
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चातुर्मास का आध्यात्मिक संदेश
चातुर्मास केवल व्रत और नियमों का समय नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, सेवा, दया और भक्ति का पर्व है। जो व्यक्ति इस अवधि में श्रद्धा से भगवान विष्णु की उपासना करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
चातुर्मास 2026 भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम और धर्म पालन का श्रेष्ठ अवसर है। यदि आप इस अवधि में नियमित पूजा, जप, दान और सात्विक जीवन अपनाते हैं, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार आपको विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
Q1. चातुर्मास 2026 कब शुरू होगा?
उत्तर: चातुर्मास 2026 की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी से होगी।
Q2. चातुर्मास कब समाप्त होगा?
उत्तर: कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी पर।
Q3. चातुर्मास में विवाह क्यों नहीं होते?
उत्तर: क्योंकि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए शुभ मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं।
Q4. चातुर्मास में सबसे श्रेष्ठ कार्य कौन-सा है?
उत्तर: भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, दान, सत्संग और सात्विक जीवन
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