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बुधवार, 10 जून 2026

निर्जला एकादशी 2026: सभी एकादशियों का फल देने वाला महाव्रत

निर्जला एकादशी 2026 व्रत कथा और पूजा विधि
निर्जला एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पुण्यदायी एकादशी मानी जाती है।



निर्जला एकादशी 2026

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष भर आने वाली सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। इसे भीम एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति वर्ष की अन्य एकादशियां नहीं कर पाता, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी 24 एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त कर सकता है।

निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किए पूरे दिन उपवास रखा जाता है। इसलिए इसे "निर्जला" अर्थात जल के बिना किया जाने वाला व्रत कहा जाता है।

वर्ष 2026 में आने वाली निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। आइए जानते हैं इसकी तिथि, पूजा विधि, कथा, नियम और धार्मिक महत्व।


निर्जला एकादशी 2026 कब है?

निर्जला एकादशी व्रत: 25 जून 2026, गुरुवार

यह एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। गुरुवार का दिन होने के कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि गुरुवार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है।

निर्जला एकादशी 2026 | व्रत, पारण और शुभ मुहूर्त

निर्जला एकादशी, वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से 24 एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है।

तिथि का समय: निर्जला एकादशी तिथि 24 जून 2026, बुधवार रात 08:09 बजे से प्रारंभ होकर 25 जून 2026, गुरुवार रात 09:14 बजे तक रहेगी।

व्रत कब रखें: उदयातिथि के अनुसार निर्जला (भीमसेनी) एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।

पारण का समय: व्रत का पारण 26 जून 2026, शुक्रवार को सुबह 05:18 बजे से 09:35 बजे के बीच करना शुभ माना गया है।

निर्जला एकादशी का महत्व: धार्मिक मान्यता है कि इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मिलता है।


निर्जला एकादशी का महत्व

निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे अधिक फल देने वाला व्रत माना गया है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करता है, उसे सभी तीर्थों के स्नान, यज्ञ, दान और 24 एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है।

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से:

  • पापों का नाश होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
  • स्वास्थ्य और आयु में वृद्धि होती है।
  • जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

निर्जला एकादशी को भीम एकादशी क्यों कहते हैं?

महाभारत के अनुसार पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे और उन्हें अधिक भूख लगती थी। वे नियमित रूप से एकादशी का उपवास नहीं कर पाते थे।

तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन निर्जला व्रत रखने का उपदेश दिया और कहा कि यदि वे इस एक दिन बिना अन्न और जल के व्रत करेंगे तो उन्हें वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होगा।

भीमसेन ने इस व्रत का पालन किया और उन्हें महान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से यह व्रत भीम एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


निर्जला एकादशी व्रत की तैयारी

व्रत से एक दिन पहले सात्विक भोजन करना चाहिए।

दशमी तिथि के दिन:

  • मांसाहार से दूर रहें।
  • लहसुन और प्याज का सेवन न करें।
  • क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें।
  • भगवान विष्णु का स्मरण करें।

रात्रि में जल्दी सोना और ब्रह्म मुहूर्त में उठना शुभ माना जाता है।


निर्जला एकादशी पूजा सामग्री

पूजा के लिए निम्न सामग्री रखें:

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
  • तुलसी दल
  • पीले पुष्प
  • धूप और दीप
  • चंदन
  • अक्षत
  • नारियल
  • पंचामृत
  • फल
  • पीला वस्त्र
  • केले
  • गंगाजल

निर्जला एकादशी पूजा विधि

1. प्रातः स्नान

सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।

2. व्रत संकल्प

भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

3. पूजा स्थान तैयार करें

पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।

4. दीपक जलाएं

घी का दीपक प्रज्वलित करें।

5. भगवान विष्णु का पूजन

चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।

6. मंत्र जाप

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।

7. विष्णु सहस्रनाम पाठ

इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

8. आरती

भगवान विष्णु की आरती करें और प्रसाद अर्पित करें।


निर्जला व्रत कैसे रखा जाता है?

निर्जला एकादशी का मुख्य नियम है कि व्रती सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी के पारण तक अन्न और जल दोनों का त्याग करता है।

हालांकि स्वास्थ्य कारणों से यदि कोई व्यक्ति पूर्ण निर्जला व्रत न कर सके तो वह अपनी क्षमता अनुसार फलाहार या जल ग्रहण कर सकता है।

भगवान भक्ति और श्रद्धा को अधिक महत्व दिया गया है।


निर्जला एकादशी पर क्या करें?

  • भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • तुलसी की सेवा करें।
  • विष्णु सहस्रनाम पढ़ें।
  • गरीबों को भोजन कराएं।
  • जलदान करें।
  • मंदिर में दीपदान करें।
  • भजन-कीर्तन करें।

निर्जला एकादशी पर क्या नहीं करें?

  • झूठ न बोलें।
  • किसी का अपमान न करें।
  • क्रोध न करें।
  • तामसिक भोजन न करें।
  • नकारात्मक विचारों से बचें।
  • विवाद और कलह से दूर रहें।

जलदान का विशेष महत्व

निर्जला एकादशी ग्रीष्म ऋतु में आती है इसलिए इस दिन जलदान का विशेष महत्व बताया गया है।

दान में आप दे सकते हैं:

  • पानी से भरा घड़ा
  • छाता
  • वस्त्र
  • पंखा
  • फल
  • शरबत
  • अन्न

धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जलदान करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।


निर्जला एकादशी के मंत्र

विष्णु मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

श्री हरि मंत्र

ॐ नमो नारायणाय

विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥



निर्जला एकादशी व्रत कथा -

हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। इसे भीम एकादशी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है।

भीमसेन और निर्जला एकादशी की कथा

महाभारत काल में पांचों पांडवों में भीमसेन सबसे अधिक बलशाली थे। उनकी माता कुंती, भाई युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव तथा द्रौपदी सभी वर्ष भर आने वाली एकादशियों का व्रत रखते थे।

लेकिन भीमसेन का स्वभाव अलग था। उन्हें बहुत अधिक भूख लगती थी। वे भोजन के बिना अधिक समय तक नहीं रह सकते थे। इसलिए वे किसी भी एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे।

एक दिन भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास जी से कहा—

"हे गुरुदेव! मेरे सभी भाई और माता एकादशी का व्रत रखते हैं, लेकिन मैं अत्यधिक भूख के कारण व्रत नहीं कर पाता। कृपया ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे मुझे सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो जाए।"

भीम की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास जी बोले—

"हे भीम! यदि तुम वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त करना चाहते हो तो ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला व्रत रखो। इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के पारण तक अन्न और जल दोनों का त्याग करो।"

व्यास जी ने आगे कहा कि इस एक दिन के कठोर व्रत से वर्ष भर की 24 एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

भीमसेन ने गुरु की आज्ञा मानकर निर्जला एकादशी का व्रत किया। उन्होंने पूरे दिन बिना अन्न और जल के भगवान विष्णु का स्मरण किया। अगले दिन विधिपूर्वक व्रत का पारण किया।

उनकी भक्ति और तपस्या से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त हुआ।

तभी से यह एकादशी भीम एकादशी और निर्जला एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।


कथा से मिलने वाली शिक्षा

निर्जला एकादशी की कथा हमें सिखाती है कि—

  • सच्ची श्रद्धा और विश्वास से किया गया व्रत महान फल देता है।
  • आत्मसंयम और तपस्या से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
  • भगवान विष्णु की भक्ति से पापों का नाश होता है।
  • एक दिन की सच्ची साधना भी जीवन को सफल बना सकती है।

निर्जला एकादशी का फल

शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से—

  • सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है।
  • पापों का नाश होता है।
  • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
  • सुख, समृद्धि और आयु में वृद्धि होती है।
  • मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
जय श्रीहरि विष्णु। 🙏🌺

भीमसेन की कथा हमें सिखाती है कि यदि व्यक्ति पूरे वर्ष कोई साधना न कर पाए, तो भी श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया गया एक सच्चा प्रयास उसे महान फल प्रदान कर सकता है।

यह व्रत आत्मसंयम, भक्ति और तपस्या का प्रतीक है।

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महिलाओं के लिए निर्जला एकादशी

विवाहित महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती हैं।

अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति हेतु यह व्रत कर सकती हैं।

गृहस्थ जीवन में सुख-शांति और आर्थिक उन्नति के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना जाता है।


निर्जला एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

यह व्रत केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है।

निर्जला एकादशी हमें सिखाती है:

  • इंद्रियों पर नियंत्रण रखना।
  • आत्मशुद्धि करना।
  • ईश्वर पर विश्वास रखना।
  • सेवा और दान का महत्व समझना।

जब मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करता है, तब आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।

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द्वादशी पारण का महत्व

एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि में पारण करके किया जाता है।

पारण से पहले भगवान विष्णु को भोग अर्पित करें और ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दान दें।

इसके बाद जल ग्रहण करके व्रत पूर्ण करें।


निर्जला एकादशी के लाभ

  • भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
  • मानसिक शांति मिलती है।
  • पापों का नाश होता है।
  • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • स्वास्थ्य और आत्मबल बढ़ता है।
  • परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

25 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाने वाली निर्जला एकादशी सनातन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने, पापों के नाश और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला माना जाता है।

श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया गया निर्जला एकादशी व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और पुण्यफल प्रदान कर सकता है। यदि स्वास्थ्य अनुमति दे तो इस महाव्रत का पालन अवश्य करें और भगवान श्रीहरि विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।


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