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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

Ayi giri Nandini


 अयि गिरिनन्दिनि (महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते ।

गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।

त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोचिनि घोषरते ।

दनुजनिरोधिनि दितिसुतरोधिनि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते ।

शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते ।

मधुमधुरे मधुकैटभभञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि शतखण्डविखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते ।

रिपुगजगण्डविदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।

निजभुजदण्डनिपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।

चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृत प्रमथाधिपते ।

दुरितदुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभयदायकरे ।

त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधि शिरोधिकृतामल शूलकरे ।

दुमिदुमितामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मुखरे ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि निजहुङ्कृतिमात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते ।

समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणितबीजलते ।

शिव शिव शुम्भ निशुम्भ महाहव तर्पित भूतपिशाचरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

धनुरनुसङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।

कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके ।

कृतचतुरङ्ग बलक्षिति रङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुतितत्पर विश्वनुते ।

भण भण भिञ्जिमि भिञ्जिमि भिङ्कृत नूपुरसिञ्जित मोहभूतपते ।

नटित नटार्ध नटी नटनायक नाटितनाट्य सुगानरते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

१०

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकान्तियुते ।

श्रितरजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकरवक्त्रवृते ।

सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते ।

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

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