धृतराष्ट्र ने संजय से कहा
की कुरुक्षेत्र के युद्ध में क्या चल रहा है
लगाव की छडी
एक मनुष्य जो अपनी फॅमिली से बहुत
जादा जुडा है,और वो किसी भी महान कार्य से कभी जीवन मे नही जुडा है
न कभी उसने किसी की मदद की है
न कभी उसने अपनी सेहत का ख्याल रखा है
न कभी डॉक्टर के इलाज या दवाई पे खर्च किया
तो इसके परिणाम स्वरूप उसे इन्फेक्शन हो गया और उसकी मृत्यु हो गई
उसने उसकी जीवनभर की कमाई उसकी फॅमिली के लिये रखी , उसकी ये अंधे लगाव ने उसका दिल पत्थर बना दिया मरणे के बाद वो सीधा नरक मैं जाता हैं और उसे वहा पे
शिक्षा भी मिलती है , उसको अभी यह पता है की उसे अभी कृष्ण नाम ही बचा सकता है ,तो वहा बहुत नामजप करता है और भगवान ने उसे नरक से निकलवाने के लिये रोता है, परिणाम स्वरूप कृष्ण के दिल को उसका रोना पिघला देता है
तो कृष्ण देखते है की क्या जीवनभर मैं उसने कोई अच्छा कर्म किया है ,तो उन्हे ऐसे मिलता हैं की उसने एक सुखा केला किसी को दिया था!
यह छोटी सी उदारता कृष्ण को काफी थी की वह उसको नरक से निकलवाने मैं सहायक हो
और वह उसे नरक से बाहर निकालने के लिये एक लकडी देता है,जो उसे वहा से ऊपर चढने मैं सहायक हो
तो वह मनुष्य इससे बहुत खुश होता है और इसे अपनी नई पूंजी मानता है
तो बाकी नरक मैं फसे हुए लोग भी उसके पीछे चलने की कोशिश करते है की शायद उनको भी नरक से बाहर निकलने
मे कोई मदद हो लेकीन वह उनको धक्का मार देता है ,उसे उस लकडी की काठी से भी लगाव होता है की यह मेरी है या इसपे सिर्फ मेरा अधिकार है !
कुछ टाईम के बाद उसको उसकी गलती का पता चल जाता है पर तब तक वो काठी गायब हो जाती है और वह वापस नरक मैं गीर जाता है


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