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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

विकट संकष्टी 5 एप्रिल 2026 गणपती अथर्वशीर्ष का पाठ और उसका अर्थ



विकट संकष्टी चतुर्थी 5 एप्रिल 2026


विकट संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश के 13 प्रमुख संकष्टी रूपों में से एक विकट गणपति को समर्पित होती है 
इस दिन का महत्व:
जीवन की कठिन बाधाओं को दूर करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है
व्रत सूर्योदय से चंद्रदर्शन तक रखा जाता है 
चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है
“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना जाता है
 
पूजा विधि:

सुबह स्नान करके गणेश जी की प्रतिमा या फोटो के सामने दीप जलाएँ 
दूर्वा (21 गांठ), मोदक या गुड़ का भोग लगाएँ
संकष्टी व्रत कथा पढ़ें
शाम को चंद्रदर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोलें

विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

प्राचीन समय में एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण दंपत्ति रहते थे। वे अत्यंत धर्मपरायण थे, लेकिन उनके जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट और आर्थिक परेशानियाँ थीं। वे प्रतिदिन भगवान गणेशजी की पूजा करते थे और उनसे अपने दुख दूर करने की प्रार्थना करते रहते थे।
एक दिन ब्राह्मण को स्वप्न में भगवान गणेशजी के विकट स्वरूप के दर्शन हुए। गणेशजी ने कहा— “यदि तुम संकष्टी चतुर्थी का व्रत श्रद्धा से करोगे और मेरी विकट रूप में पूजा करोगे, तो तुम्हारे सभी संकट दूर हो जाएंगे।”
अगले ही दिन से ब्राह्मण दंपत्ति ने विधि-विधान से संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना प्रारंभ किया। वे दिनभर उपवास रखते, शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद गणेशजी की पूजा करते और कथा सुनते।
कुछ ही समय में उनके जीवन के कष्ट दूर होने लगे। उनके घर में धन-धान्य की वृद्धि हुई, परिवार में सुख-शांति आई और सभी संकट समाप्त हो गए। यह देखकर नगर के अन्य लोगों ने भी यह व्रत करना शुरू कर दिया। जो भी श्रद्धा और नियम से यह व्रत करता, उसके जीवन के संकट दूर होने लगे।
तब से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से:
सभी प्रकार के विघ्न दूर होते हैं 
रोग-शोक का नाश होता है
धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है
मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं 





 व्रत करने की संक्षिप्त विधि

प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
दिनभर उपवास रखें।
शाम को गणेशजी के विकट स्वरूप की पूजा करें।
दूर्वा, मोदक और लाल फूल अर्पित करें।
चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलें 
           इस दीन गणपती अथर्वशीर्ष का पाठ करना बहोत शुभ होगा

गणपती अथर्वशीर्ष 

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥
अर्थ: हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ही सृष्टि के कर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। आप ही सम्पूर्ण ब्रह्म हैं और आप ही नित्य आत्मा हैं।
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥
अर्थ: मैं सत्य और धर्मयुक्त वचन कहता हूँ।
अव त्वं माम्। अव वक्तारम्।
अव श्रोतारम्। अव दातारम्।
अव धातारम्।
अवानूचानमव शिष्यम्।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥
अर्थ: हे गणपति! मेरी, वक्ता की, सुनने वाले की, देने वाले की, धारण करने वाले की और शिष्य की चारों दिशाओं से रक्षा करें।
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
त्वं सच्चिदानन्द अद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि॥
अर्थ: आप वाणी, ज्ञान, आनंद और ब्रह्मस्वरूप हैं। आप सच्चिदानंद और अद्वितीय हैं।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥
अर्थ: आप ज्ञान और विज्ञान दोनों के स्वरूप हैं।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥
अर्थ: यह सम्पूर्ण जगत आपसे उत्पन्न होता है, आपमें स्थित रहता है और अंत में आपमें ही विलीन हो जाता है।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥
अर्थ: आप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं तथा वाणी के चारों रूप भी आप ही हैं।
त्वं गुणत्रयातीतः।
त्वं अवस्थात्रयातीतः।
त्वं देहत्रयातीतः।
त्वं कालत्रयातीतः॥
अर्थ: आप तीनों गुणों, तीन अवस्थाओं, तीन शरीरों और तीनों कालों से परे हैं।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥
अर्थ: आप मूलाधार चक्र में स्थित हैं और तीनों शक्तियों के स्वरूप हैं।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्॥
अर्थ: योगीजन सदा आपका ध्यान करते हैं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमाः॥
अर्थ: आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्र हैं।
त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥
अर्थ: आप ही ॐ और तीनों लोकों के आधार हैं।
एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
एकदन्तं चतुरहस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥
अर्थ: एकदंत, चार भुजाओं वाले, पाश और अंकुश धारण करने वाले, एक हाथ से वर देने वाले, मूषक ध्वज वाले, लाल वर्ण के, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, लाल वस्त्र धारण करने वाले, लाल चन्दन से सुशोभित और लाल पुष्पों से पूजित, भक्तों पर कृपा करने वाले, सृष्टि के कारण और प्रकृति-पुरुष से परे भगवान गणेश का मैं ध्यान करता हूँ।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥
अर्थ: जो व्यक्ति प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ बनता है।
नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने।
शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥
अर्थ: व्रातों के स्वामी, गणों के स्वामी, प्रमथगणों के स्वामी, लम्बोदर, एकदंत, विघ्नों का नाश करने वाले, शिवपुत्र और वर देने वाले श्री गणेश को नमस्कार है।
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते।
स सर्वत्र सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते॥
अर्थ: जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष का पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूप होने योग्य बनता है। उसे विघ्न बाधा नहीं होती। उसे सर्वत्र सुख प्राप्त होता है और वह पाँच महापापों से मुक्त होता है।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति॥
अर्थ: शाम को पाठ करने से दिन के पाप नष्ट होते हैं, सुबह पाठ करने से रात के पाप नष्ट होते हैं। सुबह-शाम पाठ करने वाला पापमुक्त होता है।
सर्वत्राधीयानोऽविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति॥
अर्थ: हर स्थान पर इसका पाठ करने वाला विघ्नरहित रहता है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्राप्त करता है।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान्भवति॥
अर्थ: यह अथर्वशीर्ष अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। मोहवश देने वाला पाप का भागी होता है।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥
अर्थ: इसका हजार बार पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती है।
अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति॥
अर्थ: इससे गणपति का अभिषेक करने वाला वाक्पटु बनता है।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान्भवति॥
अर्थ: चतुर्थी के दिन उपवास रखकर जप करने वाला विद्वान बनता है 📿
इत्यथर्वणवाक्यम्।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचन॥
अर्थ: यह अथर्वण ऋषि का वचन है। जो इसका ज्ञान प्राप्त करता है, वह किसी से नहीं डरता।
यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान्भवति।
स मेधावान्भवति॥
अर्थ: दूर्वा से पूजा करने वाला कुबेर के समान समृद्ध होता है। लाज (लाई) से पूजा करने वाला यशस्वी और बुद्धिमान होता है।
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति॥
अर्थ: हजार मोदकों से पूजा करने वाला इच्छित फल प्राप्त करता है 
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते॥
अर्थ: घी और समिधा से यज्ञ करने वाला सब कुछ प्राप्त करता है।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रः भवति॥
अर्थ: आठ ब्राह्मणों को विधिपूर्वक सिखाने वाला सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्यग्रहण, नदी के तट या गणेश प्रतिमा के पास जप करने से मंत्र सिद्ध होता है।
महाविघ्नात् प्रमुच्यते।
महादोषात् प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति॥
अर्थ: इससे बड़े विघ्न, दोष और पाप दूर होते हैं। साधक सर्वज्ञता की ओर अग्रसर होता है 
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ:
हे परमात्मा! हम गुरु और शिष्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों मिलकर पराक्रम और उत्साह से अध्ययन करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और सफल हो। हम दोनों के बीच कभी द्वेष न हो।
तीनों प्रकार की बाधाएँ (दैविक, भौतिक, आध्यात्मिक) दूर हों — शान्ति ही शान्ति हो 

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