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बुधवार, 17 जून 2026

देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी 25 जुलाई 2026: भगवान विष्णु की योगनिद्रा और चातुर्मास का शुभारंभ

पंढरपुर के श्री विठोबा भगवान की सुंदर मूर्ति, भक्तों के लिए दिव्य दर्शन
पंढरपुर के श्री विठोबा भगवान का मनमोहक और दिव्य दर्शन। विठ्ठल-रुक्मिणी भक्तों के लिए श्रद्धा और भक्ति का पावन केंद्र।



देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी 25 जुलाई  तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। वर्ष 2026 में 25 जुलाई को आने वाली देवशयनी या आषाढ़ी एकादशी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और यहीं से चातुर्मास का शुभारंभ होता है।

 देवशयनी एकादशी का व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।


देवशयनी एकादशी क्या है?

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे हरिशयनी, पद्मा और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है।



देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व

देवशयनी एकादशी का महत्व पुराणों में विशेष रूप से वर्णित है।

इस दिन:

  • भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं।
  • चातुर्मास का प्रारंभ होता है।
  • मांगलिक कार्य सीमित हो जाते हैं।
  • साधु-संत एक स्थान पर निवास करते हैं।
  • भजन, कीर्तन, जप और तप का महत्व बढ़ जाता है।

मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और पूजा कई गुना फल प्रदान करती है।

आषाढ़ी एकादशी और पंढरपुर

आषाढ़ी एकादशी हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। इसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास का आरंभ होता है।

पंढरपुर, महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यह भगवान विठ्ठल (श्रीकृष्ण का एक रूप) और माता रुक्मिणी को समर्पित है। आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

वारी  का इतिहास-

वारी महाराष्ट्र की लगभग 800 वर्ष पुरानी महान आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी शुरुआत 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर महाराज ने आलंदी से पंढरपुर तक पदयात्रा कर की थी। बाद में संत तुकाराम महाराज ने इस भक्ति आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की और उनके पुत्र नारायण महाराज ने 1685 में संतों की पालखी परंपरा को संगठित स्वरूप दिया। समय के साथ यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन न रहकर श्रद्धा, समानता, सेवा और भाईचारे का प्रतीक बन गई। आज लाखों वारकरी विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन के लिए भजन, कीर्तन और अभंग गाते हुए पैदल पंढरपुर पहुँचते हैं, जिससे वारी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विरासत का एक अमूल्य हिस्सा बन चुकी है।

आषाढ़ी वारी का महत्व

आषाढ़ी एकादशी से पहले महाराष्ट्र के विभिन्न भागों से वारकरी (भक्त) पैदल यात्रा करते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। इस यात्रा को वारी कहा जाता है।

विशेष रूप से:

  • संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी आळंदी से निकलती है।
  • संत तुकाराम महाराज की पालखी देहू से निकलती है।
  • हजारों भक्त टाल, मृदंग और अभंग गाते हुए पंढरपुर तक पदयात्रा करते हैं।

पंढरपुर की विशेषता

  • भगवान विठ्ठल की मूर्ति एक ईंट (विट) पर खड़ी है।
  • श्रद्धालु पहले चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं।
  • इसके बाद विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर में दर्शन करते हैं।
  • "ज्ञानोबा-तुकाराम" के जयघोष से पूरा पंढरपुर भक्तिमय हो जाता है।
  • पंढरपुर में एक प्रसिद्ध लोकमान्यता प्रचलित है कि आषाढ़ी वारी में जितने श्रद्धालु भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए आते हैं, उतने ही कंकड़ भगवान विठ्ठल स्वयं चंद्रभागा नदी में डाल देते हैं। इसलिए चंद्रभागा की रेती और कंकड़ों को अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रद्धालु इन्हें भगवान के चरणों का स्पर्श मानकर श्रद्धा से नमन करते हैं।
  • हालाँकि, यह मान्यता लोकविश्वास पर आधारित है। इसका स्पष्ट उल्लेख प्रमुख धर्मग्रंथों या ऐतिहासिक अभिलेखों में नहीं मिलता, लेकिन वारकरी परंपरा में इसे गहरी श्रद्धा और आस्था के साथ स्वीकार किया जाता है।
  • मान्यता है कि चंद्रभागा नदी में स्नान करने से मन और आत्मा की शुद्धि होती है। भक्त मंदिर में दर्शन से पहले चंद्रभागा में स्नान करते हैं। नदी का अर्धचंद्राकार स्वरूप होने के कारण इसका नाम "चंद्रभागा" पड़ा।
  • पंढरपुर की रेती को भी अत्यंत पवित्र माना जाता है। संत परंपरा में कहा जाता है कि इस रेती पर अनगिनत संतों और वारकरियों के चरण पड़े हैं। इसलिए श्रद्धालु इस रेती को माथे से लगाकर भगवान विठ्ठल का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
  • आषाढ़ी वारी केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा, समानता और प्रेम का उत्सव है। हजारों दिंडियाँ कई दिनों की पदयात्रा करके भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुँचती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है।

आषाढ़ी एकादशी का संदेश

यह पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि:

  • भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।
  • समानता और भाईचारे का संदेश देता है।
  • संत परंपरा और भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाए रखता है।

प्रसिद्ध अभंग

सुंदर वह ध्यान, जो विट्ठल के रूप में ईंट पर खड़ा है,
हाथ कमर पर रखे हुए भक्तों को दर्शन देता है।

आषाढ़ी एकादशी और पंढरपुर की वारी महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा की अमूल्य धरोहर है, जो हर वर्ष लाखों लोगों को श्रद्धा, सेवा और प्रेम के सूत्र में बांधती है।

वारी  का अध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व-

वारी केवल पंढरपुर तक की एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति, समानता और मानवता का जीवंत उत्सव है। वारकरी परंपरा के अनुसार भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए श्रद्धापूर्वक पैदल वारी करने से मन को शांति, आध्यात्मिक शक्ति और ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह यात्रा समाज में जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी और ऊँच-नीच के सभी भेद मिटाकर सभी को एक सूत्र में जोड़ने का संदेश देती है। पूरे मार्ग में वारकरी संतों के अभंग, भजन, कीर्तन और "जय जय राम कृष्ण हरी" का अखंड नामस्मरण करते हुए आगे बढ़ते हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय हो जाता है और जीवन में सेवा, प्रेम, अनुशासन तथा भाईचारे की भावना का विकास होता है। यही कारण है कि वारी को केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सामाजिक समरसता का महापर्व माना जाता है।

वर्ष 2026 का वारी यात्रा इस प्रकार संपन्न होगी -

वर्ष 2026 की पंढरपुर वारी लगभग 21 दिनों तक चलने वाली अनुशासित और भक्ति से ओत-प्रोत पदयात्रा है, जिसमें लाखों वारकरी महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पैदल यात्रा करते हैं। इस वर्ष संत तुकाराम महाराज की पालखी 7 जुलाई को देहू से तथा संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी 8 जुलाई को आलंदी से प्रस्थान करेगी। 23 जुलाई को दोनों प्रमुख पालखियाँ वाखरी में मिलेंगी, जिसके बाद 24 जुलाई को पंढरपुर में भव्य प्रवेश होगा। 25 जुलाई 2026 को आषाढ़ी एकादशी के पावन अवसर पर चंद्रभागा नदी में स्नान, श्री विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन और भक्ति-कीर्तन के साथ इस ऐतिहासिक वारी यात्रा का शुभ समापन होगा। यह यात्रा श्रद्धा, अनुशासन, सेवा और संत परंपरा का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है।

भगवान विठ्ठल द्वारा भक्तों के पैरों की मिट्टी का तिलक – लोककथा

वारकरी परंपरा में एक अत्यंत भावपूर्ण लोककथा प्रचलित है कि भगवान विठ्ठल अपने भक्तों को स्वयं से भी अधिक प्रिय मानते हैं। कहा जाता है कि जब लाखों वारकरी "ज्ञानोबा-तुकाराम" का जयघोष करते हुए पंढरपुर पहुँचते हैं, तब उनके चरणों की धूल भगवान के लिए पवित्र प्रसाद के समान होती है। इसी कारण लोकविश्वास है कि भगवान विठ्ठल अपने भक्तों के पैरों की धूल को अपने मस्तक पर तिलक के रूप में धारण करते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि सच्ची भक्ति में भगवान भी अपने भक्तों के सामने प्रेम और विनम्रता से झुक जाते हैं।

यह कथा संतों की उस शिक्षा को भी दर्शाती है कि "भगवान को सबसे प्रिय उनके निष्कपट भक्त हैं।" वारकरी संत कहते हैं कि भक्तों के चरणों की धूल अहंकार का नाश करती है और प्रेम, सेवा तथा समर्पण का संदेश देती है। इसलिए वारी में कई श्रद्धालु संतों और वारकरियों के चरण स्पर्श कर उनकी चरणरज को अपने मस्तक पर लगाते हैं।

भगवान विठ्ठल द्वारा भक्तों के पैरों की मिट्टी का तिलक लगाने की यह कथा वारकरी परंपरा और लोकविश्वास का हिस्सा है। इसका स्पष्ट उल्लेख प्रमुख शास्त्रों या पुराणों में नहीं मिलता, लेकिन यह भक्ति, विनम्रता और भगवान-भक्त के प्रेम संबंध का सुंदर प्रतीक मानी जाती है।


चातुर्मास क्या है?

देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक का समय चातुर्मास कहलाता है।

चातुर्मास के दौरान:

  • विवाह आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते।
  • सात्विक जीवन अपनाया जाता है।
  • धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
  • व्रत और उपवास का महत्व बढ़ जाता है।

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देवशयनी एकादशी पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
  • तुलसी दल
  • पीले पुष्प
  • धूप
  • दीपक
  • चंदन
  • अक्षत
  • पंचामृत
  • फल
  • मिष्ठान

पूजा विधि

1. प्रातःकाल स्नान करें

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. व्रत का संकल्प लें

भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

3. भगवान विष्णु का पूजन करें

श्रीहरि को पीले पुष्प, तुलसी दल और चंदन अर्पित करें।

4. मंत्र जाप करें

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।

5. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें

विष्णु सहस्रनाम और गीता पाठ का विशेष महत्व माना जाता है।

6. रात्रि जागरण करें

भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करें।


देवशयनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सूर्यवंशी राजा मान्धाता के राज्य में एक समय भयंकर अकाल पड़ा।

प्रजा अत्यंत दुखी थी। राजा ने ऋषि अंगिरा से समाधान पूछा।

ऋषि ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत करने से राज्य की सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी।

राजा और प्रजा ने श्रद्धापूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया।

भगवान विष्णु की कृपा से राज्य में वर्षा हुई, अकाल समाप्त हो गया और सभी लोग सुखी हो गए।

तब से देवशयनी एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।


भगवान विष्णु की योगनिद्रा का रहस्य

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं।

देवशयनी एकादशी के दिन वे क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करते हैं। यह योगनिद्रा संसार के संतुलन और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।

चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं जिसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है।


व्रत के नियम

  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • सात्विक भोजन ग्रहण करें।
  • झूठ और क्रोध से बचें।
  • मांस और मदिरा का सेवन न करें।
  • भगवान विष्णु का नाम स्मरण करें।

देवशयनी एकादशी पर क्या करें?

✅ तुलसी पूजन करें।
✅ भगवान विष्णु को पीले पुष्प अर्पित करें।
✅ गीता का पाठ करें।
✅ गरीबों को अन्न दान करें।
✅ भजन-कीर्तन करें।


क्या न करें?

❌ किसी का अपमान न करें।
❌ तामसिक भोजन न करें।
❌ झूठ और छल-कपट से बचें।
❌ क्रोध और विवाद से दूर रहें।


देवशयनी एकादशी के लाभ

  • पापों का नाश होता है।
  • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
  • आर्थिक उन्नति होती है।
  • परिवार में सुख-शांति आती है।
  • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति होती है।


देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी भगवान विष्णु की विशेष आराधना का पावन पर्व है। यह दिन चातुर्मास के शुभारंभ का प्रतीक है और भक्तों को धर्म, भक्ति तथा आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजन करने से श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॥

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